नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ द्वारा “शोध में नैतिकता का विकास” (Research Ethics) विषय पर चार दिवसीय अनुसंधान पद्धति कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। यह कार्यशाला 2 से 5 अप्रैल, 2025 तक यूजीसी-एमएमटीटीसी, कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर और सर जे.सी. बोस परिसर में आयोजित की जा रही है। कार्यशाला में देशभर से पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो और पीएचडी शोधार्थी भाग ले रहे हैं। Research Ethics
विशेषज्ञों ने बताया शोध में नैतिकता का महत्व Research Ethics
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र का आयोजन देवदार हॉल, एमएमटीटीसी, कुमाऊं विश्वविद्यालय में किया गया, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के आईएनएसए वैज्ञानिक प्रो. रूप लाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डी.एस. रावत ने की। इस अवसर पर प्रो. संतोष कुमार, प्रो. ललित तिवारी, प्रो. नीता बोरा शर्मा, प्रो. चित्रा पांडे, प्रो. एन.जी. साहू, प्रो. शुचि बिष्ट, प्रो. एच.सी.एस. बिष्ट, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. महेंद्र राणा सहित अनेक गणमान्य शिक्षाविद् उपस्थित थे।
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कार्यशाला के पहले दिन विशेषज्ञों ने शोध में नैतिकता के विभिन्न आयामों पर व्याख्यान दिया।
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प्रो. रूप लाल ने अनुसंधान नैतिकता और उसके मौलिक सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शोधकर्ताओं को डेटा संग्रह, विश्लेषण और लेखन के दौरान विभिन्न नैतिक मुद्दों का सामना करना पड़ता है, जिनका समाधान ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ किया जाना चाहिए।
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उन्होंने शिकारी पत्रिकाओं, साहित्यिक चोरी (प्लैगरिज्म) और शोध प्रकाशन की गुणवत्ता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विस्तृत चर्चा की।
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कुलपति प्रो. डी.एस. रावत ने शोधकर्ता के रूप में अपने अनुभव साझा किए और युवा शोधकर्ताओं को नैतिकता के मूल सिद्धांतों को अपनाने की प्रेरणा दी।
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तीसरा व्याख्यान दून विश्वविद्यालय के प्रो. एम.एस.एम. रावत ने दिया, जिन्होंने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत शोध नैतिकता के महत्व और शोध प्रकाशन की गुणवत्ता बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की।
शोध कार्य में गुणवत्ता और नैतिकता के लिए प्रतिबद्धता आवश्यक
कार्यशाला के दौरान शोध की गुणवत्ता, प्रायोगिक और उन्नत शिक्षा, वैदिक ज्ञान प्रणाली और आधुनिक शोध दृष्टिकोण को लेकर गहन विमर्श किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता के बिना कोई भी शोध पूर्ण नहीं हो सकता और नैतिक अनुसंधान ही समाज के लिए उपयोगी साबित होता है।
कार्यक्रम में शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी Research Ethics
कार्यशाला में दोनों परिसरों के 173 शोधार्थियों ने भाग लिया। इस दौरान डॉ. एम.सी. आर्य ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया। आयोजन समिति में डॉ. मनीषा त्रिपाठी, डॉ. दीपक कुमार, डॉ. मोहन लाल, डॉ. अनीता कुमारी, डॉ. रेजा, डॉ. दीक्षा मेहरा, पंकज, गणेश, दिव्या, कुणाल, अक्षय, हिमांशु, मयंक, दीपक देव, कुंदन बिष्ट सहित अन्य सदस्यों ने विशेष योगदान दिया।
प्रतिवेदन लेखन की जिम्मेदारी श्री सूरज ने निभाई। कार्यशाला के आगामी सत्रों में शोध प्रकाशन में नैतिकता, डेटा प्रबंधन, प्लैगरिज्म से बचाव और गुणवत्ता अनुसंधान पर गहन चर्चा होगी।
Research Ethics
यह कार्यशाला शोधकर्ताओं को नैतिक अनुसंधान, निष्पक्षता और गुणवत्ता प्रकाशन के महत्व से परिचित कराएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि नैतिक रूप से सही अनुसंधान न केवल शोधकर्ता की प्रतिष्ठा बढ़ाता है, बल्कि समाज और विज्ञान को भी नई दिशा प्रदान करता है।