Miyanwala History: मियांवाला देहरादून उत्तराखंड की ऐतिहासिक जागीर और गुलेरिया राजपूतों की गौरवशाली विरासत : ukjosh

Miyanwala History: मियांवाला देहरादून उत्तराखंड की ऐतिहासिक जागीर और गुलेरिया राजपूतों की गौरवशाली विरासत


Miyanwala History : उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित मियांवाला सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि गढ़वाल और गुलेर रियासतों के ऐतिहासिक संबंधों का एक जीवंत प्रमाण है। यह वह स्थान है, जिसे गढ़वाल के राजा प्रदीप शाह (1709-1772) ने गुलेरिया राजपूतों को जागीर के रूप में प्रदान किया था। इस क्षेत्र का इतिहास गढ़वाल, टिहरी और हिमाचल प्रदेश की गुलेर रियासत के बीच गहरे वैवाहिक और सामाजिक संबंधों को दर्शाता है।

गुलेर रियासत से गढ़वाल तक: मियांवाला की स्थापना Miyanwala History

हिमाचल प्रदेश की गुलेर रियासत और गढ़वाल-टिहरी के शाही परिवारों के बीच मजबूत पारिवारिक संबंध थे। गढ़वाल के राजा प्रदीप शाह की महारानी गुलेर रियासत से थीं, और इसी तरह टिहरी गढ़वाल के राजा प्रताप शाह की महारानी भी गुलेर से थीं, जिन्हें सम्मानपूर्वक गुलेरिया जी कहा जाता था। यह महारानी टिहरी के राजा कीर्ति शाह की माता और महाराजा नरेंद्र शाह की दादी थीं।

इन वैवाहिक संबंधों के चलते गुलेरिया समुदाय के लोग गढ़वाल में आकर बसने लगे। इन्हें “डोलेर” भी कहा जाता था, क्योंकि वे राजकुमारी के विवाह के साथ दहेज के रूप में गढ़वाल आए थे। इन्हीं गुलेरिया राजपूतों को गढ़वाल के राजा प्रदीप शाह ने मियांवाला से कुआंवाला तक की विशाल जागीर प्रदान की।

“मियां” उपाधि: एक सम्मानजनक संबोधन, न कि जाति Miyanwala History

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “मियां” कोई जाति नहीं, बल्कि गुलेरिया राजपूतों को दी गई सम्मानसूचक उपाधि थी। “मियां” शब्द गढ़वाल और गुलेर के इतिहास में एक प्रतिष्ठित संबोधन था, जो इन राजपूतों की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को दर्शाता था।

गढ़वाल और टिहरी के राजाओं ने गुलेरिया समुदाय को जागीरें प्रदान कीं, जिससे वे गढ़वाल, टिहरी और पौड़ी के कई क्षेत्रों में बस गए। इनमें से टिहरी गढ़वाल के भिलंगना ब्लॉक में कंडारस्यूं और जखन्याली गांव, नरेंद्रनगर के रामपुर, पौड़ी गढ़वाल में नौगांव खाल और उत्तरकाशी के नंदगांव शामिल हैं।

रानी गुलेरिया जी: टिहरी गढ़वाल की अद्वितीय शख्सियत

टिहरी गढ़वाल के इतिहास में रानी गुलेरिया जी का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। जब उनके पति राजा प्रताप शाह की मृत्यु हुई, तब उनका पुत्र कीर्ति शाह नाबालिग था। अंग्रेजों ने इस अवसर का लाभ उठाकर टिहरी गढ़वाल पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन रानी गुलेरिया ने अपनी सूझबूझ और रणनीति से इसे विफल कर दिया।

उन्होंने 1913 में बद्रीनाथ मंदिर के निर्माण और अन्य धार्मिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी दृढ़ता और नेतृत्व ने टिहरी गढ़वाल को स्थिरता दी और वे महिला सशक्तिकरण का एक ऐतिहासिक उदाहरण बनीं।

क्या मियांवाला का संबंध मुस्लिम समुदाय से है?

एक आम भ्रांति यह भी है कि “मियांवाला” नाम मुस्लिम समुदाय से जुड़ा हो सकता है। लेकिन इतिहास इस धारणा को नकारता है। अगर यह नाम मुस्लिम पृष्ठभूमि से होता, तो इस क्षेत्र में किसी मस्जिद या इस्लामिक सांस्कृतिक धरोहर की उपस्थिति होती, लेकिन ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता।

दरअसल, “मियां” उपाधि का उपयोग गुलेरिया राजपूतों के लिए किया जाता था, जो मूल रूप से गुलेर से आए थे और गढ़वाल के शाही परिवारों के विश्वसनीय सहयोगी और जागीरदार बने

डूंगा जागीर और मियांवाला: इतिहास की धुंध में विलीन विरासत

गढ़वाल के राजाओं ने केवल मियांवाला ही नहीं, बल्कि डूंगा जागीर भी सम्मानित परिवारों को दी थी। देहरादून में डूंगा हाउस, जो परेड ग्राउंड के सामने स्थित है, डूंगा जागीर की एकमात्र निशानी के रूप में बचा हुआ है।

मियांवाला के संदर्भ में, समय के साथ इस क्षेत्र की पहचान धुंधली होती गई। मूल गुलेरिया राजपूतों ने अपनी पैतृक भूमि छोड़ दी, जागीरें सिकुड़ती चली गईं, और आज यह क्षेत्र केवल नाममात्र का “मियांवाला” रह गया है।

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मियांवाला जागीर: एक गौरवशाली इतिहास की गवाही

गढ़वाल के 51वें राजा प्रदीप शाह (1709-1772) के शासनकाल में मियांवाला जागीर गुलेरिया राजपूतों को दी गई थी। बाद में, 1803 में गोरखाओं ने गढ़वाल पर आक्रमण कर दिया, और 1815 में अंग्रेजों ने इसे अपने अधीन कर लिया।

हालांकि, मियांवाला का नाम आज भी इस गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है। यह स्थान न केवल गढ़वाल और गुलेर के ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे इतिहास, परंपराएं और जागीरें समय के साथ विलुप्त हो जाती हैं

Miyanwala History

मियांवाला सिर्फ एक कस्बा नहीं, बल्कि गढ़वाल और गुलेर के बीच ऐतिहासिक रिश्तों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और जागीरदारी प्रथा की एक जीवंत मिसाल है। यह हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल अतीत की किताबों में नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान में भी जीवित रहता है—कभी स्मारकों के रूप में, तो कभी नामों के रूप में

-शीशपाल गुसाईं


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